श्री कृष्ण ने नेमिनाथ भगवान से दिव्यचक्षु प्राप्त किए थे, उसके बाद उन्होंने यह गीता का उपदेश दिया था।
गीता में तो कृष्ण भगवान दो ही शब्द कहना चाहते हैं। वे दो शब्द लोगों की समझ में आ सकें, ऐसा नहीं है। इसलिए गीता का इतना बड़ा स्वरूप दिया और उस स्वरूप को समझने के लिए लोगों ने फिर से विवेचन लिखे हैं। कृष्ण भगवान ने खुद ने कहा है कि, ‘मैं जो गीता में कहना चाहता हूँ उसका स्थूल अर्थ एक हज़ार में से एक व्यक्ति समझ सकेगा। ऐसे एक हज़ार स्थूल अर्थ समझनेवाले व्यक्तियों में से एक व्यक्ति गीता का सूक्ष्म अर्थ समझ सकेगा। ऐसे एक हज़ार सूक्ष्म अर्थ समझनेवालों में से एक व्यक्ति सूक्ष्मतर अर्थ को समझ सकेगा। ऐसे एक हज़ार सूक्ष्मतर अर्थ को समझनेवालों में से एक व्यक्ति गीता का सूक्ष्मतम अर्थ अर्थात् मेरा आशय समझ सकेगा!’ कृष्ण भगवान क्या कहना चाहते थे कि ‘वही एक’ उसे समझ सकेगा। अब इस साढ़े तीन अरब की बस्ती में कृष्ण भगवान को समझने में किसका नंबर लगेगा? कृष्ण भगवान जो कहना चाहते थे वे दो ही शब्दों में कहना चाहते थे, उसे तो, जो खुद कृष्ण बन चुका हो, वही समझ सकता है और कह सकता है, अन्य किसी का काम नहीं है। आज ‘हम’ खुद, कृष्ण आए हैं, तुझे तेरा जो काम निकालना हो वह निकाल ले। कृष्ण क्या कहना चाहते हैं?
व्यक्ति मर जाए तब कहते हैं न कि, ‘अंदर से चले गए।’ वह क्या है? वह ‘माल’ है और यहाँ पड़ा रह जाता है, वह ‘पैकिंग’ है। इन चर्मचक्षुओं से दिखता है वह पैकिंग है और अंदर ‘माल’ है, मटीरियल है। देयर आर वेराइटीज़ ऑफ पैकिंग्स। कोई आम का पैकिंग, कोई गधे का पैकिंग, तो कोई मनुष्य का पैकिंग या स्त्री का पैकिंग है लेकिन अंदर माल शुद्ध है, एक सरीखा है सभी में। पैकिंग तो भले ही कैसा भी हो, सड़ा हुआ भी हो, लेकिन व्यापारी पैकिंग की जाँच नहीं करता, अंदर ‘माल’ ठीक है या नहीं, उतना देख लेता है। उसी तरह हमें भी अंदर के माल के दर्शन कर लेने हैं।
कृष्ण भगवान कहते हैं, ‘‘अंदर जो ‘माल’ है वही मैं खुद हूँ, वे ही कृष्ण हैं, उन्हें पहचान तो निबेड़ा आएगा तेरा, बाकी लाख जन्म भी तू गीता के श्लोक गाएगा तो भी तेरा निबेड़ा नहीं आएगा!’’
पैकिंग और माल इन दो शब्दों में, कृष्ण भगवान जो कुछ कहना चाहते थे वह है और ये बुद्धिशाली लोग गीता का अर्थ करने जाते हैं, उसकी पुस्तकें निकालते हैं! मूलतः तो इन लोगों को अर्थ करना ही नहीं आता और बड़े-बड़े विवेचन, टीकाएँ लिखकर अर्क निकालने गए हैं, लेकिन ये तो खुद के स्वच्छंद से अपना नाम फैलाने के लिए ही करते हैं! बाकी तो, दो ही शब्दों में कृष्ण भगवान का ‘अंतरआशय’ समा जाता है।
बेटा यदि हॉस्टल में पढ़ रहा हो तब फादर उसे कड़े शब्दों में पत्र लिखते हैं, ‘तू पढ़ता नहीं है और मेरे पैसे बिगाड़ रहा है, सिनेमा-नाटक देखता रहता है, कुछ भी नहीं करता है।’ तब बेटा क्या करता है कि बाप का पत्र खुद के फ्रेन्ड को दिखाता है और कहता है कि, ‘देख न, मेरे फादर कैसे हैं? जंगली हैं, लोभी हैं और क्रोधी हैं, कंजूस हैं।’ लड़का ऐसा क्यों कहता है? क्योंकि उसे फादर की बात समझ में नहीं आती, वह फादर का अंतरआशय नहीं समझ सकता है। फादर और बेटे में मात्र पच्चीस ही सालों का डिफरन्स है, फिर भी बाप का अंतरआशय बेटा नहीं समझ पाता, तो फिर कृष्ण भगवान को गए तो पाँच हज़ार साल हो गए, तो पाँच हज़ार साल के डिफरेन्स में कृष्ण भगवान का अंतरआशय कौन समझ सकेगा? उनका अंतरआशय कौन बता सकेगा? वह तो जो ‘खुद’ कृष्ण भगवान हैं, वे ही बता सकते हैं! महावीर के अंतरआशय की बात कौन बता सकता है? वह तो जो खुद महावीर हैं, वे ही बता सकते हैं। महावीर का भी २५०० साल का डिफरेन्स हो चुका है।पहले के जमाने में तो पच्चीस साल के डिफरेन्स में बाप का अंतरआशय बेटा समझ जाता था, जबकि आज तो पच्चीस साल के अंतर में अंतरआशय समझने की शक्ति नहीं रही है, तो फिर कृष्ण की बात किस तरह समझ में आएगी? अभी गीता के बारे में बहुत कुछ लिखा जा रहा है, लेकिन लिखनेवाला उसमें से एक बाल बराबर भी नहीं समझता। यह तो ऐसा है कि अंधे को मिला अंधा, बोरे में मिला तिल से तिल, न रहा तिल न ही रही घाणी! उसके जैसा है। हाँ, वह गलत नहीं है, करेक्ट है, लेकिन वह बात फर्स्ट स्टेन्डर्ड के मास्टर जैसी है और वह ठीक है। यहाँ हमारे पास कैसी बात होती है? कॉलेज के अंतिम साल की बात है। जैसे उसमें फर्स्ट स्टेन्डर्ड की बात होती है, वैसे ही इसमें गीता के विवेचन की बात होती है। सिर्फ
‘ज्ञानीपुरुष’ के पास ही सर्व शास्त्रों की यथार्थ बात मिल सकती हैं।
संदर्भ :
Book Name: आप्तवाणी 2 (Page #379 - Paragraph #4, Entire Page #380 & #381, Page #382 Paragraph #1 & #2)Related Questions:
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